दो दिवसीय एकल नाट्य महोत्सव पूर्णिया का आगाज, चर्चा नाटकों का।

पूर्णिया में इन दिनों नाटकों का दौर चल रहा है, पूर्णिया शुरू से ही नाट्य कला के क्षेत्र में अपना एक अहम योगदान देता आया है।पूर्णिया में 3 रंगकर्मियों को भिखारी ठाकुर पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। साथ ही एक वरिष्ठ रंगकर्मी को राष्ट्रपति पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। अभी कला भवन नाट्य विभाग तथा रेणु रंगमंच संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में एकल नाट्य महोत्सव 2024 का आयोजन कला भवन पूर्णिया में किया जा रहा है,

जिसमे दर्शक कला प्रेमी ने नाटकों का भरपूर लुप्त उठाया, आपकी सरिता से शुरू हुई नाटक ने तो शुरुआत में ही दर्शकों का मन लाडली बेटियां पर जाने को विवश कर दी , पढ़ाई के प्रति जुनून देखने से बनता था, कभी हार कर फांसी के फंदे से लटकने का विचार करती ,फिर हिमत न हार कर ये विचार को त्याग दी, परिवार भी रू की तंगी से पढ़ा नही पा रहा था ,गिरते परते अपने से स्कूल की टीचर बनी और 2500 मासिक  रू कमाते इंटर तक पढ़ाई की , फिर समाज की नोक झोंक ताने बाने ने उसे और मजबूत बना दिया और उसकी मेहनत लगन ने परिवार का साथ भी मिला और वो मेहनत कर BA की परीक्षा भी पास कर गई 2ND डिविजन से। 
उसे न ज्यादा मार्क्स लाने की जिद थी ना फेल की , उसे बस पढ़ाई कर आगे बढ़ने का जुनून था।
2 दूसरी नाटक देवतार गाथा ने अपने शुरुआती नृत्य स्टाइल में रविंद्र नाथ टैगोर की फोटो को दर्शकों के सामने ला कर बंगला साहित्य से सीधे दर्शको को जोड़ दिया, भाषा इंग्लिश थी , पर नृत्य प्रस्तुत से दर्शक हाव भाव से पूरे नाटक को समझ रहे थे ,
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असमंजस बाबू की आत्म कथा ने अपने किरदार में कई बदलाव को दिखाया ,कभी हिंदू मुस्लिम एकता कभी अकेलेपन का दंश ,कभी समाज को कुछ अच्छा करने के लिए अकेले चलने की राह और  साथ में पशु प्रेम भी बखूबी दिखाया , जैसे जैसे नाटक आगे बढ़ रही थी मानो दर्शको के रोंगटे खरे कर रहे थे, मस्जिद से अजान और मंदिर से शंख ध्वनि की आवाज ने माहौल को पूरा सन्नाटा कर दिया आगे क्या ? फिर कलाकार ने एक एक बयांगी एक एक दर्द एक एक किरदार को जीवंत कर दिया , एक गरीब से खरीदा हुआ पालतू कुता ने असमंजस बाबू को एक साथी की तरह मील गया , एक सहारा मील गया, वो इस तरह रम गया की मानो इंसान की तरह हसने लग किसी भी बात पर, आगे कहनी ने दर्शको को रोने तक विवश कर दिया ।

दोनो हाथो में गीता और कुरान की पुस्तके लिए काफी कुछ संदेश दें गया किरदार।
4 नौटंकी बाज ने एक युवा कलाकार के दर्द को बयां किया ,नाटक के शौक ने उसे सबों से अलग कर दिया , यहां तक कि अपनी मां पिता और गर्ल फ्रेंड तक से ,
नाटकों के अच्छे प्रशिक्षक नही रहने और जो है वो दूर रहने की विवशता को भी दिखाया।  साथ ही NSD जैसी संस्था में आरक्षण को लेकर भी प्रहार किया गया, कटाक्ष किया गया की नाट्य कला में आरक्षण न लागू हो बस कलाकार हो कोई जाति धर्म एससी एसटी ओबीसी जेनरल न हो बस कलाकार हो और उसका चयन भी कलाकार के रूप में हो ,आरक्षण भी हो तो कला में प्रतियोगिता कर के हो। अंत में हार कर खुद को गोली मार लेता है। लेखक को आगे कुछ और प्रयोग करने चाहिए थे, नकारात्मक से आगे सक्रात्मक पहल की ओर जाने थे। पर आरक्षण तक को अपने लेखनी में सिमटा कर तक कर हार कर छोर दिया गया। बेहतरीन परफॉर्मेंस नोटंकीबाज का।
दर्शको को बांधे रखा। आगे आज हम कुछ और नए नाटक को देखेंगे और चर्चा करेंगे।
शशि रंजन कुमार
निजी अनुभव के आधार पर 

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