पश्चिम चंपारण थारू जनजाति क्षेत्र में भ्रमण


बिहार के पश्चिम चंपारण का भ्रमण :-
थारू जनजातीय समुदाय से मिलना भी एक सुखद अनुभूति रही,
मेरे कई कामों में सामाजिक कार्य भी एक है।
पटना से टीम के साथ पश्चिम चंपारण के बगहा अंतर्गत कई जगहों पर भ्रमण के दर्मियां जनजातियों समुदाय से भी मिलना रहा,जिन्हे मैं बिहार के अलग अलग जिलों में भी देखा हूं, और उनकी संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर भी ले गया हूं,
पर एक खास जनजाति समुदाय के बारे में सिर्फ पढ़ा था,सुना था ,थारू समुदाय के बारे में,उनसे कभी मिला नही था। नाम पूछने पर नेपाली महतो बताए, मैं चौक गया, महतो टाईटल सब नाम के साथ जोड़ते है, अक्सर बिहार में कई जातियां महतो नाम के साथ लगाते है।
खरवार जनजातीय समुदाय भी कई जगहों पर महतो लगाते है। पर ये खरवार समुदाय से नही थे, ये थारू समुदाय से है, इनकी वेश भूषा भी अन्य जनजातीय समुदाय से अलग शहरीकरण में ढल हुई थी, इनका विस्तार नेपाल और भारत के बीच जंगलों के तराई क्षेत्र में है। वो बताते है की  शादी का विस्तार अन्य जिलों में हम सब नही किए है। नेपाल में शादी होती है। रंग रूप भी नेपाल के लोगो जैसा ही मिलता जुलता था,

 भाषा
नेपाली महतो जी ने बताया की हम सब भोजपुरी बोलते है।
 गूगल पर जानकारी  - थारू, नेपाल और भारत के सीमावर्ती तराई क्षेत्र में पायी जाने वाली एक जनजाति है। नेपाल की सकल जनसंख्या का लगभग 6.6% लोग थारू हैं। भारत में बिहार के चम्पारन जिले में और उत्तराखण्ड के नैनीताल और ऊधम सिंह नगर में थारू पाये जाते हैं। थारुओं का मुख्य निवास स्थान जलोढ़ मिट्टी वाला हिमालय का संपूर्ण उपपर्वतीय भाग तथा उत्तर प्रदेश के उत्तरी जिले वाला तराई प्रदेश है। ये हिन्दू धर्म मानते हैं तथा हिन्दुओं के सभी त्योहार मनाते हैं।
घर
कई जगह प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत  सभी लोगो के पक्के के मकान देखने को मिले,
कुछ जगहों पर कच्चे मकान थे।

सभी लोग खेती बाड़ी के कार्यों में लगे हुए थे, सब्जियों का उत्पादन अच्छे तरीके से कर रहे थे।
जाते समय बड़े ही प्यार से कच्चा मटर रास्ते के लिए लिए दिए,मैने भी थोड़ा सा रख लिए आदर से।
घने जंगलों  और नदियों के धार के बीच से गुजरता रास्ता भी एक अलग आनंद दिए हुए था।


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